बादलों की ओट में
लुप्त नहीं हुआ है चन्द्रमा,
वह केवल दृष्टि से ओझल है
जैसे सत्य
अज्ञान के आवरण में
कभी-कभी छिप जाता है ।
काली घटाएँ घिरती हैं आसमान में
और बरस जाती हैं धरा पर,
मन का आँगन भी
उनके साथ सावन-भादों सा
भीगा-भीगा रहता है ।
जीवन भी ऐसा ही है
कभी धूप,
कभी घनघोर घटाएँ,
कभी उजास,
कभी अनंत प्रतीक्षा ।
नेह के घट से
अमृत छलकता है,
तो उसी प्रेम की गहराई में
अश्रु भी जन्म लेते हैं ।
सुख और दुःख
वास्तव में विरोधी नहीं,
एक ही अनुभूति के
दो किनारे हैं ।
पूनम की रात है,
फिर भी नभ घनपूरित है
चाँदनी को तरसती आँखें
यह भूल जाती हैं
कि चाँदनी बाहर नहीं,
मन के भीतर भी है ।
बादल चन्द्रमा को
कब तक ढक पाएँगे ?
आवरण बदलते हैं,
मगर आकाश वही रहता है ।
दृश्य बदलते हैं,
लेकिन सत्य शाश्वत रहता है ।
मनुष्य भी…,
अपने जीवन रूपी बादलों में
स्वयं को खोजता है
बस ढंग बदलता रहता है
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